आधुनिक "स्लीप हाइजीन" और प्राचीन वैदिक "स्वर विज्ञान" का समन्वय स्लीप डिसऑर्डर का स्थायी समाधान - आरजेएस वक्ता.
आधुनिक "स्लीप हाइजीन" और प्राचीन वैदिक "स्वर विज्ञान" का समन्वय स्लीप डिसऑर्डर का स्थायी समाधान - आरजेएस वक्ता.
चिकित्सा और आध्यात्मिक विशेषज्ञों ने नींद की गोलियों के पूर्ण बहिष्कार और प्राचीन स्वर विज्ञान को अपनाने का किया आह्वान- आरजेएस कार्यक्रम
साधक ओम प्रकाश ने योग निद्रा का सजीव प्रदर्शन किया कहा-आहार, विहार और निद्रा के सही संतुलन से वृद्धावस्था में भी अपार ऊर्जा संभव
पटना / दिल्ली: राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच) और पाॅजिटिव मीडिया के संयुक्त तत्वावधान में विश्व नींद दिवस(13 मार्च) के अवसर पर 15 मार्च 2026 को आयोजित एक विशेष संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि नींद की गोलियों पर बढ़ती निर्भरता मानव स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है। इस संगोष्ठी में आधुनिक "स्लीप हाइजीन" और प्राचीन वैदिक "स्वर विज्ञान" के समन्वय को इस वैश्विक संकट के एकमात्र स्थायी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया।
फिजिकल व वर्चुअल आरजेएस पीबीएस के 530 वें कार्यक्रम के सह-आयोजक
82 वर्षीय साधक ओम प्रकाश ने योग निद्रा का सजीव प्रदर्शन किया, जो इस बात का जीवंत प्रमाण था कि आहार, विहार और निद्रा के सही संतुलन से वृद्धावस्था में भी अपार ऊर्जा और जीवनी शक्ति प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने संकल्प लिया कि वे आरजेएस "सकारात्मक संवाद" के माध्यम से एक ऐसे विश्व का निर्माण करेंगे जहां व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से शांत और वैचारिक रूप से सकारात्मक हो।
संगोष्ठी के दौरान आरजेएस पीबीएच के राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने इस चर्चा को मात्र एक चिकित्सा परामर्श से ऊपर उठाते हुए इसे एक सामाजिक आंदोलन के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने घोषणा की कि आरजेएस पीबीएच का मिशन वैश्विक युद्धों और घरेलू अस्थिरता से उपजी नकारात्मकता का मुकाबला करना है। उन्होंने डा. मुन्नी कुमारी को टीफा 26 में शामिल होने की घोषणा की और उन्हें मंच पर ससम्मान बैठाया।
डा.मुन्नी कुमारी ने कहा कि
नई पीढ़ी में व्याप्त "डिजिटल पैरालिसिस" और नींद के विकारों को दूर करना होगा। उदय कुमार मन्ना ने स्पष्ट किया कि इन सभी चर्चाओं को "आजादी का अमृत महोत्सव" पुस्तक में "जनभागीदारी" के एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में ग्रंथ 07 में संकलित किया जाएगा।
प्राचीन स्वर विज्ञान और जैविक घड़ी का रहस्य
आधुनिक चिकित्सा के पूरक के रूप में श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी चरणाश्रित गिरी ने "स्वर विज्ञान" के सूक्ष्म सिद्धांतों को प्रस्तुत किया। उन्होंने तर्क दिया कि आधुनिक चिकित्सा केवल अनिद्रा के लक्षणों का इलाज करती है, जबकि प्राचीन ऋषि-मुनियों ने शरीर की आंतरिक लय को नियंत्रित करने की तकनीक विकसित की थी। स्वामी चरणाश्रित गिरी ने कहा कि मानव शरीर सूर्य और चंद्रमा द्वारा संचालित एक जैविक घड़ी है। पश्चिम में अब लोग "स्लीप पार्लर" में सोने के लिए मोटी रकम चुका रहे हैं, जो एक सभ्यता के पतन का संकेत है।
दवाओं पर निर्भरता के खिलाफ चिकित्सा विद्रोह
संगोष्ठी के सबसे प्रमुख सत्र में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व राष्ट्रीय संयुक्त सचिव और मेडिको सोशल एक्टिविस्ट डॉ नरेश चावला ने नींद के लिए रसायनों के उपयोग पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने विशेष रूप से अल्प्राजोलम और जोल्पीडेम जैसी दवाओं के अंधाधुंध उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी। डॉ चावला ने तर्क दिया कि आधुनिक समाज अपनी बुनियादी जैविक प्रक्रियाओं के लिए भी रसायनों का गुलाम बनता जा रहा है।
डॉ नरेश चावला ने कहा कि दुनिया भर में करोड़ों लोग केवल सोने के लिए दवाओं पर निर्भर हैं। यह एक रासायनिक मूर्च्छा है, नींद नहीं। नींद मस्तिष्क के लिए "सीपीयू प्रोसेसिंग समय" की तरह है, जहां पूरे शरीर की मरम्मत होती है। यदि हम इसे गोलियों के माध्यम से बाधित करते हैं, तो हम अनिवार्य रूप से अपने जैविक हार्डवेयर को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। डॉ चावला ने "टाइप ए" व्यक्तित्व वाले लोगों को इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बताया। ये वे लोग हैं जो अत्यधिक महत्वाकांक्षी हैं, हमेशा भागदौड़ में रहते हैं और कभी शांत नहीं हो पाते। यही कारण है कि बीस और तीस की उम्र के युवाओं में दिल के दौरे की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो देश के लिए एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक नुकसान है।
महामंडलेश्वर स्वामी चरणाश्रित गिरी ने विस्तार से बताया कि कैसे दाहिनी और बाईं नासिका (पिंगला और इड़ा नाड़ी) का प्रवाह हमारे चयापचय और मानसिक स्थिति को नियंत्रित करता है। उन्होंने इसे "महाकाल विद्या" कहा, जो न केवल स्वास्थ्य को ठीक कर सकती है, बल्कि मृत्यु को भी टालने की क्षमता रखती है। उनके अनुसार, दाहिनी नासिका के प्रवाह के दौरान भोजन करना और स्नान करना अनिवार्य है, जबकि बाईं नासिका के सक्रिय होने पर पानी पीना और ध्यान करना चाहिए। उन्होंने सूर्यास्त के समय "त्राटक" (मोमबत्ती की लौ पर एकाग्रता) के अभ्यास की सिफारिश की ताकि मस्तिष्क में मेलटोनिन हार्मोन का प्राकृतिक स्राव हो सके, जिसे आधुनिक स्क्रीन की नीली रोशनी ने नष्ट कर दिया है।
अनिद्रा के सामाजिक और आर्थिक परिणाम
आहार पाइन अभियान , बिहार के राष्ट्रीय संयोजक एमपी सिन्हा ने नींद के संकट को "पंचतत्व" (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) के संतुलन से जोड़ा। उन्होंने कहा कि नींद की कमी सीधे तौर पर आहार और विहार (आचरण) को बिगाड़ देती है। जब व्यक्ति की आंतरिक शांति भंग होती है, तो उसका सामाजिक ढांचा ढहने लगता है। एमपी सिन्हा के अनुसार, समाज में बढ़ रहे तलाक के मामलों और घरेलू हिंसा के पीछे नींद की कमी से उपजी चिड़चिड़ापन और नकारात्मकता एक प्रमुख कारण है। जो व्यक्ति ठीक से सो नहीं सकता, वह अपनी "लक्ष्मी" (संपत्ति) का प्रबंधन भी नहीं कर सकता, क्योंकि थका हुआ दिमाग सही निर्णय लेने में अक्षम होता है।
इस विचार को साहित्यकार रजनी प्रभा ने आगे बढ़ाते हुए कहा कि लेखक और बुद्धिजीवी अक्सर रात में काम करने को अपनी प्राथमिकता बताते हैं, लेकिन यह एक भारी जैविक ऋण है। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया की चकाचौंध ने लोगों को मानसिक रूप से पंगु बना दिया है। संगोष्ठी में ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का उदाहरण दिया गया जहां बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर सख्त कानून बनाए जा रहे हैं। रजनी प्रभा ने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी रचनात्मक और सकारात्मक हो, तो हमें उन्हें डिजिटल व्यसन से बाहर निकालकर गहरी नींद की ओर ले जाना होगा।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी और स्लीप हाइजीन प्रोटोकॉल
संगोष्ठी के दौरान श्रोताओं और विशेषज्ञों के बीच एक विस्तृत प्रश्नोत्तरी सत्र हुआ, जिसमें व्यावहारिक समाधानों पर चर्चा की गई।
प्रश्न: उच्च तनाव वाली नौकरियों में काम करने वाले शहरी पेशेवर अपनी नींद का प्रबंधन कैसे कर सकते हैं?
डॉ नरेश चावला का उत्तर: इसका समाधान "स्लीप हाइजीन" के सख्त पालन में है। सबसे पहले, आपको अपने सोने और जागने का एक निश्चित समय तय करना होगा, चाहे वह सप्ताहांत ही क्यों न हो। दूसरा, सोने से कम से कम एक घंटा पहले "डिजिटल सूर्यास्त" करें, यानी सभी स्क्रीन बंद कर दें। तीसरा, अपने कमरे के तापमान को ठंडा और स्थिर रखें। यदि बिस्तर पर जाने के बीस मिनट के भीतर नींद नहीं आती है, तो बिस्तर छोड़ दें। दूसरे कमरे में जाकर कोई किताब पढ़ें या टहलें। बिस्तर पर तभी लौटें जब शरीर वास्तव में थक जाए। यह आपके मस्तिष्क को बिस्तर और अनिद्रा के बीच के तनावपूर्ण संबंध को तोड़ने में मदद करता है।
प्रश्न: अनिद्रा जैसी शारीरिक समस्या का आध्यात्मिक समाधान स्वर विज्ञान के माध्यम से कैसे संभव है?
स्वामी चरणाश्रित गिरी का उत्तर: स्वर विज्ञान एक जैविक तकनीक है। यदि आपको नींद नहीं आ रही है, तो बाईं करवट लेकर लेटें। इससे आपकी दाहिनी नासिका (पिंगला) सक्रिय हो जाएगी, जो शरीर को शांत करती है और पाचन में मदद करती है। भोजन करते समय हमेशा ध्यान दें कि आपकी दाहिनी नासिका चल रही हो। यहां तक कि अपने नाखून या बाल भी तभी काटें जब दाहिना स्वर चल रहा हो, ताकि आपकी कोशिकाओं में भय की स्मृति जमा न हो। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शरीर विज्ञान है।
प्रश्न: क्या बहुत कम नींद लेकर भी अत्यधिक उत्पादक बने रहना संभव है?
डॉ किशोर झुनझुनवाला (निदेशक, मेदांता अस्पताल) का उत्तर: यद्यपि आठ घंटे की नींद मानक है, लेकिन हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या लेनिन जैसे नेताओं का उदाहरण देखते हैं जो बहुत कम घंटों की नींद में भी अत्यंत ऊर्जावान रहते हैं। यह "योग निद्रा" और "पावर नैप" के माध्यम से संभव होता है। गहरी नींद के बीस मिनट के अंतराल मस्तिष्क के सिनेप्स को फिर से जीवंत कर सकते हैं। आईसीयू जैसे गंभीर देखभाल वातावरण में हमने देखा है कि जो रोगी सो नहीं पाते, उनका घाव भरने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इसलिए, यदि आपके पास समय की कमी है, तो आपको "चेतन विश्राम" की कला सीखनी होगी।
निष्कर्ष और सकारात्मक मीडिया का संकल्प
संगोष्ठी के समापन पर उदय कुमार मन्ना ने दोहराया कि आरजेएस पीबीएच इन सभी चर्चाओं को केवल संवाद तक सीमित नहीं रखेगा। विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च के अवसर पर एक आगामी कार्यक्रम की घोषणा की गई, जिसमें कला और संस्कृति के माध्यम से सकारात्मकता फैलाने का प्रयास किया जाएगा।
संगोष्ठी का अंतिम निष्कर्ष स्पष्ट था: आधुनिक दुनिया रसायनों और कृत्रिम रोशनी के जाल में फंसी हुई है। एक स्वस्थ, उत्पादक और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण केवल तभी संभव है जब हम "स्लीप हाइजीन" और "स्वर विज्ञान" के मेल से अपनी जैविक जड़ों की ओर लौटें।
आकांक्षा मन्ना
हेड क्रिएटिव टीम
आरजेएस पीबीएस -आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया
9811705015
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