"जैव-मंडल को समझने के लिए" डा. दिनेश अल्बर्टसन ने आरजेएस का 516वां कार्यक्रम को-ऑरगेनाइज किया

"जैव-मंडल को समझने के लिए" डा. अल्बर्टसन ने आरजेएस का 516वां कार्यक्रम को-ऑरगेनाइज किया 
भारत का 'उधार' लिया गया भविष्य: विशेषज्ञों ने 4% जल संकट और जैव-मंडल के पतन की चेतावनी दी

प्रकृति पर्व के रूप में आरजेएस की टीआरडी26 और टीफा26 पाॅजिटिव आर्मी ने लोहड़ी, मकर संक्रांति, पोंगल,और माघ बिहू की बधाईयां दीं।

नई दिल्ली – राम जानकी संस्थान (RJS) पॉजिटिव मीडिया द्वारा आयोजित 516वें राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रमुख वैज्ञानिकों, सरकारी सलाहकारों और पर्यावरणविदों ने भारत के पारिस्थितिक पथ का एक गंभीर मूल्यांकन प्रस्तुत किया। "अंडरस्टैंडिंग द बायोस्फीयर" (जैव-मंडल को समझना) शीर्षक वाले इस कार्यक्रम में एक खतरनाक गणितीय संकट की ओर इशारा किया गया: भारत वर्तमान में दुनिया की लगभग 18% आबादी का बोझ उठा रहा है, जबकि उसके पास दुनिया के ताजे पानी के संसाधनों का केवल 4% हिस्सा है। 

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि "प्रकृति के साथ संघर्ष" की वर्तमान जीवनशैली को बदलकर "प्रकृति के साथ सामंजस्य" नहीं बिठाया गया, तो देश अपनी जीवन रक्षक प्रणालियों के आसन्न पतन का सामना कर सकता है।
इस सत्र की अध्यक्षता RJS के राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने की। उन्होंने इस कार्यक्रम को 2026 के "संकल्प वर्ष" के लॉन्च के रूप में प्रस्तुत किया। मन्ना ने प्राचीन श्लोकों का उद्धरण देते हुए कहा कि जैव-विविधता मानव अस्तित्व की नींव है। उन्होंने भारत के "अमृत काल" के दौरान पर्यावरण की रक्षा के लिए नागरिकों की एक "पॉजिटिव आर्मी" (सकारात्मक सेना) बनाने का आह्वान किया।
पारिस्थितिक कमी का गणित

अरावली जैव-विविधता पार्क (DDA) के वैज्ञानिक और फील्ड बायोलॉजिस्ट डॉ. दिनेश अलबरसन ने भारत के संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि देश में अब 31 करोड़ (310 मिलियन) वाहन हैं और रोजाना लाखों लीटर औद्योगिक कचरा (एफ्लुएंट) हमारी जल प्रणालियों में सीधे छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि अकेले दिल्ली में औद्योगिक कचरे के बहाव का पैमाना इतना अधिक है कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बीमार कर रहा है।

डॉ. अलबरसन ने "विषम आवश्यकता" (asymmetric necessity) की वैज्ञानिक अवधारणा पेश की। उन्होंने स्पष्ट किया, "हमें यह महसूस करना चाहिए कि यदि मनुष्य आज पृथ्वी से गायब हो जाएं, तो अधिकांश पौधे, सूक्ष्मजीव और कवक फलते-फूलते रहेंगे। लेकिन, मनुष्य इन सूक्ष्मजीवों के बिना जीवित नहीं रह सकता। जैव-विविधता का नुकसान सीधे तौर पर नई बीमारियों और पूर्ण पारिस्थितिक पतन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।" उन्होंने जोर दिया कि हालांकि मनुष्य एक नया जैव-मंडल 'बना' नहीं सकते, लेकिन उनमें नष्ट हो चुकी जमीनों को फिर से जंगलों में बदलने की शक्ति है।

नीतिगत ढांचा और वैश्विक नेटवर्क

मुख्य अतिथि और भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पूर्व सलाहकार डॉ. जी.वी. सुब्रमण्यम ने भारत के संरक्षण प्रयासों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखा। उन्होंने यूनेस्को के "मैन एंड बायोस्फीयर" (MAB) कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया, जो 1971 में मनुष्य और पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करने के लिए शुरू किया गया था। भारत की इसमें औपचारिक भागीदारी 1986 में नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना के साथ शुरू हुई थी। आज, भारत में 18 ऐसे रिजर्व हैं जो 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

डॉ. सुब्रमण्यम ने इन क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए त्रि-स्तरीय प्रणाली का विवरण दिया: "कोर" (Core) क्षेत्र, जो अनुसंधान के लिए पूरी तरह सुरक्षित है और जहां मानवीय गतिविधि प्रतिबंधित है; "बफर" (Buffer) क्षेत्र, जिसका उपयोग शिक्षा और सीमित अनुसंधान के लिए होता है; और "ट्रांज़िशन" (Transition) क्षेत्र, जहाँ सतत विकास और सामुदायिक सहयोग की अनुमति है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश में 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित "कोल्ड डेजर्ट" (शीत मरुस्थल) को एक महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्र बताया। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "हमने यह पृथ्वी अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं पाई है, बल्कि इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।" उन्होंने प्रकृति की पूजा करने वाले भारतीय लोकाचार की ओर लौटने का आह्वान किया।

वॉटर बैंक' और सांस्कृतिक जिम्मेदारी

पर्यावरणविद् आर.के. बिश्नोई ने modern science और प्राचीन ज्ञान के बीच की कड़ी के रूप में "पंचमहाभूत" (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की अवधारणा को रखा। बिश्नोई समुदाय की गौरवशाली विरासत—जिसने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी—का जिक्र करते हुए उन्होंने आधुनिक समाज की आलोचना की, जो प्राकृतिक आवरण को हटाकर पृथ्वी को "नग्न" कर रहा है।

बिश्नोई ने "इंजीनियर के रूप में ग्लेशियर" का रूपक पेश करते हुए बताया कि ग्लेशियर गर्मियों में पानी की निरंतर आपूर्ति के लिए बनाए गए एक "वॉटर बैंक" की तरह हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि राजस्थान जैसे क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन, जहाँ जल स्तर 600 फीट तक गिर गया है, भविष्य के 'सुरक्षा कोष' को खत्म करने जैसा है। उन्होंने "मल्चिंग" (जैविक पदार्थों से मिट्टी को ढंकना) और "इन्सेक्ट होटल" (कीटों के लिए आश्रय) बनाने जैसे व्यावहारिक सुझाव दिए ताकि जैव-विविधता बनी रहे।

जमीनी स्तर की चुनौतियां और व्यक्तिगत ईमानदारी

संगोष्ठी में संरक्षण कानूनों के कार्यान्वयन में आने वाली व्यावहारिक विफलताओं पर भी चर्चा हुई। प्रतिभागी सरिता कपूर ने "ईमानदारी की कमी" पर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि कैसे कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में तैनात कर्मचारी ही पर्यटकों को प्लास्टिक की बोतलें छुपाकर ले जाने के तरीके बताते हैं। डॉ. अलबरसन ने इस पर टिप्पणी की कि सरकार हर जगह मौजूद नहीं हो सकती; जैव-मंडल की सुरक्षा व्यक्तिगत नैतिकता और सार्वजनिक जिम्मेदारी पर टिकी है। मध्य प्रदेश के दयाराम सरोलिया ने रहीम की प्रसिद्ध पंक्तियों—"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून"—के माध्यम से जल संरक्षण को एक आध्यात्मिक और मानवीय आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत किया। नागपुर की डॉ. कविता परिहार ने मकर संक्रांति जैसे प्रकृति पर्वों को स्वास्थ्य और जैविक नवीनीकरण से जोड़ा। नागपुर की रति चौबे, देवास के दयाराम मालवीय आदि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

भविष्य के लिए संकल्प

कार्यक्रम के समापन पर उदय मन्ना ने RJS के आगामी रोडमैप की घोषणा की। उन्होंने बताया कि इन चर्चाओं को एक स्थायी ऐतिहासिक रिकॉर्ड के रूप में पुस्तक और मासिक समाचार पत्र में प्रकाशित किया जाएगा। आगामी 23 जनवरी (पराक्रम दिवस) और 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को इस "टीफा26 पॉजिटिव आर्मी" के माध्यम से जागरूकता अभियान को और तेज किया जाएगा। विस्तृत जानकारी के लिए 20 जनवरी 2026 को पाॅजिटिव मीडिया कांफ्रेंस का‌ आयोजन होगा।

मणिपुर की पेबम शकुंतला देवी ने धन्यवाद प्रस्ताव पेश करते हुए "जियो और जीने दो" के दर्शन पर जोर दिया। उन्होंने "मीडिया साक्षरता" का आह्वान किया ताकि नागरिक केवल नकारात्मकता के बजाय सकारात्मक और समाधान-आधारित समाचारों को प्राथमिकता दें।

संगोष्ठी का समापन "वनस्पति शांति" की प्रार्थना के साथ हुआ। कार्यक्रम का मुख्य संदेश स्पष्ट था: भारत के पास मौजूद 4% ताजे पानी की रक्षा उसी गंभीरता और तीव्रता से की जानी चाहिए जैसी हम अपनी राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करते हैं। जैव-मंडल का स्वास्थ्य ही राष्ट्र की वास्तविक संपत्ति है। आरजेएस की टेक्निकल टीम ने कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया।https://www.youtube.com/live/QUic7otgYuk?si=vOttUzSwMgur2d7x

आकांक्षा मन्ना 
हेड क्रिएटिव टीम,
आरजेएस पीबीएस -आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया 
9811705015

Comments

Popular posts from this blog

आरजेएस के बोधि दिवस जागरण सप्ताह उद्घाटन में सामाजिक न्याय हेतु बुद्ध का वैज्ञानिक मार्ग उजागर

प्रबुद्ध समाजसेवी रमेश बजाज की प्रथम पुण्यतिथि पर स्वास्थ्य चिकित्सा कैंप व भंडारे का आयोजन। #rjspbhpositivemedia

Population Growth for Sustainable Future was organised by RJS PBH on 7th July2024.