राष्ट्रीय युवा दिवस पर आरजेएस सम्मेलन: स्वामी विवेकानंद की विरासत के लिए 'सकारात्मक संकल्प क्रांति' का आह्वान.

राष्ट्रीय युवा दिवस पर आरजेएस सम्मेलन: स्वामी विवेकानंद की विरासत के लिए 'सकारात्मक संकल्प क्रांति' का आह्वान.
स्वामी विवेकानंद की वैश्विक सफलता का आधार उनकी अटूट 'इच्छाशक्ति' थी- स्वामी ज्ञानानंद 

नई दिल्ली— स्वामी विवेकानंद की जयंती (राष्ट्रीय युवा दिवस) के अवसर पर आरजेएस कार्यक्रम में भारतीय युवाओं के 'पूर्ण सशक्तिकरण' का आह्वान किया गया। राम जानकी संस्थान (आरजेएस) पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस द्वारा 12 जनवरी 2026 को आयोजित इस मैराथन वेबिनार में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद, व्यास मुनि ने युवाओं में बढ़ते अवसाद, शहरी अलगाव और पर्यावरणीय गिरावट जैसी राष्ट्रीय चुनौतियों पर चर्चा की। 
आकाशवाणी, दूरदर्शन के कबीर लोक गायक दयाराम सारोलिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
अतिथियों का स्वागत कार्यक्रम के सह-आयोजक मध्य प्रदेश देवास टीआरडी26 के सशक्त आरजेसियन कबीर भजन व लोक गायक कमल मालवीय ने किया। स्वामी विवेकानन्द जैसे गुरूओं की प्रेरणा से युवाओं को दिशा दिलाते कबीर साहेब की अमृतवाणी से उन्होंने सभी का मन मोह लिया।सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भगवद गीता के प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान को आधुनिक पर्यावरण विज्ञान और 'समाधान-आधारित पत्रकारिता' से जोड़ना था।
आरजेएस पीबीएस के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने कहा कि 20 जनवरी को एक मीडिया कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएगी। इसमें टीफा राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय संरक्षकों और टीफा26 की घोषणा और आरजेएस की छठी पुस्तक और 'रियल सक्सेस स्टोरीज' की सहित 23 जनवरी को 77 वें गणतंत्र दिवस अंतरराष्ट्रीय महोत्सव की रूपरेखा प्रस्तुत की जाएगी।
 फील्ड बायोलॉजिस्ट डॉ. दिनेश अल्बरसन ने कहा कि कि राष्ट्र की सफलता उन युवाओं पर निर्भर करती है जो "शारीरिक रूप से मजबूत, मानसिक रूप से सतर्क और नैतिक रूप से सही" हों।
डॉ. अल्बरसन ने 14 जनवरी को 'हमारी पृथ्वी को एक जीवमंडल (बायोस्फीयर) के रूप में समझना' विषय पर एक विशेष कार्यक्रम को-ऑर्गेनाइज की घोषणा की। कार्यक्रम में भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय के पूर्व सलाहकार डॉ. जी.बी. सुब्रमण्यम युवाओं को संरक्षण का रोडमैप प्रदान करेंगे।
सम्मेलन की आध्यात्मिक नींव जीईओ गीता संस्थान के संस्थापक गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी द्वारा रखी गई। अपने मुख्य संबोधन में उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद की वैश्विक सफलता का आधार उनकी अटूट 'इच्छाशक्ति' थी। शिकागो धर्म संसद का उल्लेख करते हुए स्वामी ज्ञानानंद ने बताया कि विवेकानंद ने भगवद गीता को समस्त मानवीय ज्ञान की नींव के रूप में स्थापित किया था। उन्होंने सम्मेलन का मुख्य संदेश 'दरिद्र नारायण' की सेवा को बताया, जिसका अर्थ है गरीबों और वंचितों की सेवा के माध्यम से ईश्वर को पाना।

स्वामी ज्ञानानंद ने युवाओं से आग्रह किया, "यदि युवाओं को कोई नशा करना ही है, तो वे राष्ट्र के गौरव और सेवा का नशा करें।" उन्होंने चेतावनी दी कि युवावस्था का 'स्वर्ण युग' अक्सर तनाव और चिड़चिड़ेपन में बर्बाद हो जाता है, जो समाधान खोजने की क्षमता को रोकता है। उन्होंने युवाओं से नशों की लत के बजाय वंचित वर्ग के उत्थान के लिए अपनी ऊर्जा लगाने का आह्वान किया।

इस आध्यात्मिक दृष्टि के पूरक के रूप में गुजरात के महा अमृत विश्वविद्यालय के प्रबंध न्यासी व्यासमुनि चकबापा ने आधुनिक शिक्षा और शहरी जीवन का विश्लेषण किया। अरावली के जंगलों से बात करते हुए चकबापा ने आधुनिक स्कूलों को 'भय की फैक्ट्री' करार दिया, जो केवल रटने वाली विद्या पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि शहरों की 'फ्लैट संस्कृति' ने संयुक्त परिवारों के भावनात्मक समर्थन तंत्र को नष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, "शहरों में आज ऐसी संस्कृति विकसित हो गई है जहाँ पड़ोसी पड़ोसी को नहीं जानता। यह अलगाव उस भावनात्मक आदान-प्रदान को सुखा देता है जो हमें जीवित रखता है।"
उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य संकट के उदाहरण देते हुए एक मेधावी छात्रा और एक युवा क्रिकेटर की कहानी साझा की, जो असफलता के कारण गंभीर अवसाद में चले गए थे। इसके समाधान के रूप में चकबापा ने प्रकृति-केंद्रित शिक्षा और 'प्रसाद' (सात्विक और स्वस्थ भोजन) को अपनाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने समाज में व्याप्त 'मैगी संस्कृति' की आलोचना की, जो उनके अनुसार अगली पीढ़ी की शारीरिक और मानसिक नींव को कमजोर कर रही है।

पारिवारिक जिम्मेदारी के विषय पर डॉ. कविता परिहार ने कहा कि सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत माता-पिता दोनों से होनी चाहिए। उन्होंने इस धारणा को चुनौती दी कि बच्चों के संस्कारों के लिए केवल माताएं जिम्मेदार हैं। डॉ. परिहार के अनुसार, पिता को भी बच्चों की जीवनशैली और खान-पान की आदतों पर नजर रखने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

कला जगत की ओर से कमल मालवीय और दयाराम सरोलिया ने शारीरिक शुद्धता और व्यावसायिक सफलता के बीच संबंध को रेखांकित किया। मालवीय ने युवा कलाकारों को धूम्रपान और अत्यधिक चाय से बचने की सलाह दी ताकि वे अपनी 'आंतरिक और बाहरी आवाज' को सुरक्षित रख सकें। सरोलिया ने अपने चिकित्सक बच्चों का उदाहरण देते हुए बताया कि पारंपरिक जीवन शैली आधुनिक व्यावसायिक उत्कृष्टता के साथ पूरी तरह मेल खाती है।

वरिष्ठ गीता विद्वान डॉ. आर.एस. मिश्रा ने इस मिथक को तोड़ा कि भगवद गीता केवल बुजुर्गों के लिए है। उन्होंने तर्क दिया कि यह ग्रंथ युवाओं के जीवन के 'युद्धक्षेत्र' के लिए एक मार्गदर्शिका है। उन्होंने 'विकर्म' (क्या नहीं करना चाहिए) के ज्ञान को भारत जैसे युवा राष्ट्र के लिए अनिवार्य बताया।

उदय कुमार मन्ना ने आगामी पहलों की घोषणा करते हुए बताया कि 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। साथ ही, स्थानीय पार्कों में 'पब्लिक एड्रेस सिस्टम' के माध्यम से सुबह की सैर करने वालों तक सकारात्मक विचार और पर्यावरण संरक्षण के टिप्स पहुँचाने की योजना भी शुरू की गई है। अगस्त 2026 में एक विशाल 'स्वतंत्रता दिवस शिखर सम्मेलन' आयोजित किया जाएगा, जिसमें तीन वर्षों की सकारात्मक उपलब्धियों का दस्तावेजीकरण किया जाएगा।

कार्यक्रम का समापन रेखा सरोलिया द्वारा प्रस्तुत संत कबीर के संदेश के साथ हुआ: "रूखी-सूखी खाय के, ठण्डा पानी पीव। देख पराई चूपड़ी, मत ललचावे जीव।" संतोष और सादगी के इस संदेश को उन सभी समस्याओं का अंतिम समाधान बताया गया जो आज युवाओं और पर्यावरण के समक्ष खड़ी हैं। आरजेएस पीबीएच के इस सम्मेलन ने प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के संगम के माध्यम से भारतीय युवाओं को 'उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको' का मंत्र पुनर्जीवित कर दिया है।

आकांक्षा मन्ना 
आरजेएस पीबीएस -आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया 
9811705015

Comments

Popular posts from this blog

आरजेएस के बोधि दिवस जागरण सप्ताह उद्घाटन में सामाजिक न्याय हेतु बुद्ध का वैज्ञानिक मार्ग उजागर

प्रबुद्ध समाजसेवी रमेश बजाज की प्रथम पुण्यतिथि पर स्वास्थ्य चिकित्सा कैंप व भंडारे का आयोजन। #rjspbhpositivemedia

Population Growth for Sustainable Future was organised by RJS PBH on 7th July2024.